पाण्डित्य परम्परा परिषद

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पाण्डित्य परम्परा क्या है?

पाण्डित्य परम्परा भारतीय ज्ञान-परम्परा की वह अखण्ड धारा है जिसमें विद्या, शास्त्र, तर्क, अध्यापन, साधना, संस्कार और लोककल्याण का ज्ञान गुरु से शिष्य तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता है। यह केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन को धर्म, सत्य और विवेक के अनुसार जीने की परम्परा है।

1. पाण्डित्य का मूल अर्थ

"पण्डित" शब्द संस्कृत के "पण्ड्" धातु से बना है, जिसका अर्थ है—

  • ज्ञान प्राप्त करना
  • विवेक रखना
  • सत्य का निर्णय करना

इसलिए पाण्डित्य का अर्थ केवल बहुत अधिक पढ़ा-लिखा होना नहीं है, बल्कि ऐसा ज्ञान होना है जो विवेक, विनय, धर्म और लोकहित से युक्त हो।

शास्त्रों में कहा गया है— "पण्डा आत्मविषया बुद्धिः यस्य सः पण्डितः।" अर्थात् जिसके पास आत्मा, धर्म और सत्य का विवेकपूर्ण ज्ञान है, वही वास्तविक पण्डित है।

2. परम्परा का मूल अर्थ

परम्परा का अर्थ है—

  • गुरु से शिष्य तक
  • पीढ़ी से पीढ़ी तक
  • बिना टूटे ज्ञान का प्रवाह

अर्थात् जो ज्ञान, आचार और संस्कार निरन्तर आगे बढ़ते रहें, वही परम्परा है।

3. पाण्डित्य परम्परा का समग्र अर्थ

पाण्डित्य परम्परा वह व्यवस्था है जिसमें—

  • वेद, वेदाङ्ग, उपनिषद्, दर्शन, पुराण, स्मृति आदि का अध्ययन होता है।
  • गुरु शिष्य को केवल पुस्तकें नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन भी सिखाता है।
  • शास्त्रार्थ द्वारा सत्य की खोज की जाती है।
  • समाज को धर्म, नीति और संस्कृति का मार्गदर्शन दिया जाता है।
  • ज्ञान को सुरक्षित रखकर अगली पीढ़ियों तक पहुँचाया जाता है।

4. पाण्डित्य परम्परा के मूल स्तम्भ

  1. गुरु-शिष्य परम्परा
  2. स्वाध्याय (निरन्तर अध्ययन)
  3. अध्यापन (शिक्षण)
  4. शास्त्रार्थ (तर्कपूर्ण विचार-विमर्श)
  5. साधना और आचार
  6. लोकहित एवं धर्मरक्षा
  7. ज्ञान का संरक्षण और प्रसार

5. पाण्डित्य परम्परा का उद्देश्य

  • सत्य की खोज
  • धर्म की रक्षा
  • समाज का मार्गदर्शन
  • संस्कृति का संरक्षण
  • चरित्र निर्माण
  • आध्यात्मिक उन्नति
  • ज्ञान की अखण्ड धारा बनाए रखना

6. पाण्डित्य परम्परा में अध्ययन के प्रमुख विषय

  • चार वेद
  • छह वेदाङ्ग
  • उपनिषद्
  • षड्दर्शन
  • रामायण
  • महाभारत
  • अठारह पुराण
  • धर्मशास्त्र
  • न्याय एवं मीमांसा
  • व्याकरण
  • काव्य एवं साहित्य
  • ज्योतिष
  • आयुर्वेद
  • योग
  • संगीत एवं कलाएँ

7. एक सच्चे पण्डित के गुण

  • विनम्रता
  • सत्यनिष्ठा
  • शास्त्रज्ञान
  • तर्कशक्ति
  • करुणा
  • आत्मसंयम
  • धर्मपालन
  • लोकसेवा
  • निष्पक्ष निर्णय
  • निरन्तर स्वाध्याय

8. काशी और पाण्डित्य परम्परा

भारत में काशी को प्राचीन काल से पाण्डित्य की राजधानी माना गया है। यहाँ वेद, व्याकरण, न्याय, मीमांसा, वेदान्त, ज्योतिष, काव्य और शास्त्रार्थ की समृद्ध परम्परा विकसित हुई। देश-विदेश से विद्यार्थी यहाँ अध्ययन हेतु आते थे और विद्वानों की सभाओं में शास्त्रार्थ के माध्यम से ज्ञान का विकास होता था।

9. पाण्डित्य परम्परा की सरल परिभाषा

"गुरु से शिष्य तक वेद, शास्त्र, धर्म, विवेक, संस्कार और लोककल्याणकारी ज्ञान के सतत हस्तांतरण की अखण्ड व्यवस्था को पाण्डित्य परम्परा कहते हैं।"

या संक्षेप में— "पाण्डित्य परम्परा वह जीवित ज्ञान-धारा है जिसमें विद्या, विवेक, धर्म और संस्कार का संरक्षण, संवर्धन और प्रसार गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से होता है।"

यही कारण है कि भारतीय सभ्यता में पाण्डित्य परम्परा को केवल शिक्षा की पद्धति नहीं, बल्कि सनातन ज्ञान की जीवंत परम्परा माना गया है।

गोला गोकर्ण नाथ मंदिर/श्री गोकर्णनाथ

गोला गोकर्ण नाथ मंदिर/श्री गोकर्णनाथ भारत के उत्तर प्रदेश के गोला गोकर्णनाथ में एक हिंदू मंदिर है, और इसे गोला गोकर्ण नाथ के शिव मंदिर के रूप में भी जाना जाता है। यह भगवान शिव को समर्पित एक मंदिर है। गोला गोकर्ण नाथ को उत्तर गोकर्ण क्षेत्रिंग भी कहा जाता है, गोला गोकर्णनाथ दुनिया का एकमात्र ऐसा शिवलिंग है जिसका आकार गाय के कान जैसा है।

वराह पुराण, स्कंद पुराण और शिव पुराण के अनुसार, देवताओं और असुरों के बीच तारकामाय युद्ध के अंत में, देवताओं की विजय हुई। एक बार, ऋषि सनत्कुमार ने भगवान ब्रह्मा से पूछा कि भगवान शिव ने हिरण का रूप क्यों धारण किया और उत्तर गोकरण, दक्षिण गोकरण और श्रृंगेश्वर के पवित्र तीर्थ कैसे अस्तित्व में आए।

भगवान ब्रह्मा ने बताया कि ऋषि नंदी ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर, भगवान शिव ने उन्हें शाश्वत भक्ति का वरदान दिया और घोषणा की कि नंदी की पूजा सदा प्रत्येक पवित्र तीर्थ में उनके समक्ष की जाएगी।

नंदी की तपस्या की चमक ने देवताओं को चिंतित कर दिया, और वे भगवान शिव की खोज में जुट गए। तीनों लोकों की यात्रा करने के बाद, वे हिमालय की तलहटी में स्थित एक विशाल वन में पहुँचे, जहाँ उन्होंने एक भव्य स्वर्णिम हिरण देखा। भगवान विष्णु ने तुरंत पहचान लिया कि वह हिरण स्वयं भगवान शिव हैं। जब देवताओं ने उन्हें पकड़ने का प्रयास किया, तो शिव अंतर्धान हो गए, और उनका दिव्य सींग तीन भागों में विभाजित हो गया। श्रृंग शब्द का अर्थ है "सींग"। इसका शीर्ष भाग भगवान इंद्र को, मध्य भाग भगवान ब्रह्मा को और आधार भाग भगवान विष्णु को प्राप्त हुआ था।

तब भगवान शिव ने स्वर्ग से घोषणा की: "मेरी दिव्य सत्ता के स्वरूप के रूप में इन तीनों भागों को स्थापित करो। ये पृथ्वी पर मेरे कानों के समान होंगे। जो कोई भी इन पवित्र स्थानों पर सच्चे मन से मेरा आह्वान करेगा, मैं स्वयं उसकी प्रार्थना सुनूंगा। 'गो' का अर्थ है पृथ्वी और 'कर्ण' का अर्थ है कान। इन तीनों स्थानों पर मैं शाश्वत रूप से पवित्र गोकरण लिंग के रूप में निवास करूंगा।"

तदनुसार, देवताओं ने आधार भाग को उत्तर गोकरण (गोला गोकरणनाथ) में, मध्य भाग को बागमती नदी के किनारे स्थित श्रृंगेश्वर में (जो आज बिहार के मधेपुरा जिले में सिंहेश्वर के नाम से जाना जाता है) और शीर्ष भाग को स्वर्ग में स्थापित किया।

बाद में, जब रावण के पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) ने स्वर्ग पर विजय प्राप्त की, तो रावण ने स्वर्ग के इस भाग को लंका ले जाने का प्रयास किया। हालांकि, समुद्र तट पर अपनी संध्या प्रार्थना करते समय, उसने इसे जमीन पर रख दिया, जहां यह अचल हो गया। अपनी अपार शक्ति के बावजूद, रावण इसे फिर से उठा नहीं सका। तब से, वह पवित्र स्थान महाबलेश्वर या दक्षिण गोकरण के नाम से जाना जाता है, जो वर्तमान कर्नाटक राज्य में स्थित है।

इसी कारण पुराणों में इन तीनों तीर्थों को सामूहिक रूप से आत्मतत्त्व गोकरण लिंग कहा गया है। गोला गोकरणनाथ में स्थापित पवित्र लिंग भगवान शिव के दिव्य सींग के मूल आधार का प्रतिनिधित्व करता है, जहां भक्तों की हार्दिक प्रार्थनाएं सीधे भगवान महादेव तक पहुंचती हैं।

औरंगजेब के आक्रमण के दौरान चमत्कार

एक बार, कुख्यात मुगल शासक औरंगजेब ने श्री गोकरणनाथ के पवित्र मंदिर को ध्वस्त करने के लिए अपनी सेना भेजी। जब सैनिकों ने आरी से प्राचीन श्री वृद्धेश्वर नाथ (बुद्धे बाबा) शिवलिंग को नष्ट करने का प्रयास किया, तो मंदिर परिसर में स्थित प्राचीन कैमी वृक्ष से अचानक असंख्य मधुमक्खियां निकलीं और आक्रमणकारी सेना पर भयंकर हमला किया, जिससे वे घबराकर भागने पर मजबूर हो गए। आज भी बुधे बाबा के शिवलिंग पर आरी के निशान स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं।

आज का पवित्र मंदिर

मंदिर में आज भी कई प्राचीन मूर्तियाँ और पवित्र अवशेष संरक्षित हैं। भगवान गोकर्णनाथ का दिव्य रूप अत्यंत दुर्लभ और मनमोहक है। श्रावण माह के दौरान, भारत के कोने-कोने से भक्त पवित्र कांवड़ लेकर आते हैं और भगवान शिव को पवित्र जल अर्पित करते हुए उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। उस समय, गोला गोकर्णनाथ का पूरा कस्बा भक्ति और आध्यात्मिकता के एक भव्य केंद्र में परिवर्तित हो जाता है।

चेत्र (अप्रैल) माह में एक महीने का भव्य मेला आयोजित किया जाता है जिसे चेती मेला के नाम से जाना जाता है।

सावन मेला - श्रावण माह में गोकर्णनाथ धाम का महत्व बढ़ जाता है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु पवित्र शिव मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। कांवड़िया पहले तीर्थ सरोवर में स्नान करके स्वयं को शुद्ध करते हैं और फिर मंदिर में प्रवेश करते हैं, जहां ज्योतिर्लिंग पर गंगाजल अर्पित किया जाता है। कथा के अनुसार, श्रावण माह में जब समुद्र मंथन हुआ, तो चौदह प्रकार के माणिक निकले। इनमें से तेरह को राक्षसों में बाँट दिया गया, सिवाय हलाहल (विष) के। भगवान शिव ने हलाहल को पी लिया और उसे अपने गले में धारण कर लिया। इसीलिए शिव को नीलकंठ (नीला गला) कहा जाता है। विष के तीव्र प्रभाव को कम करने के लिए, भगवान शिव ने अपने सिर पर अर्धचंद्र धारण किया। इसके बाद सभी देवताओं ने विष के प्रभाव को कम करने के लिए भगवान शिव को गंगाजल अर्पित करना शुरू कर दिया। चूंकि यह घटना श्रावण माह में घटी थी, इसलिए तब से शिव भक्त इस माह में गंगाजल अर्पित करते हैं। यह तीर्थयात्रा प्रत्येक वर्ष जुलाई-अगस्त में श्रावण माह के पूरे 30 दिनों तक चलती है। अनुमान है कि इस एक महीने की अवधि में लगभग 10 से 15 लाख तीर्थयात्री गोकर्णनाथ धाम की यात्रा करते हैं।

आलेख

।। डॉ बुद्धिनाथ मिश्र।।

(वरिष्ठ साहित्यकार) ई० प्रभात खबर.कॉम द्वारा दिनाक -०४/१२/२०१३ का अवलोकन कर सकते है

छोटी काशी की बड़ी करवट-

भारतीय समाज में तीन लोक से न्यारी काशी की महिमा ऐसी है कि देश के हर भाग के लोग उसके सान्निध्य में रहना चाहते हैं. चूंकि काशी नगरी को इधर से उधर नहीं किया जा सकता, इसलिए विभिन्न क्षेत्रों के प्रसिद्ध शैव केंद्रों को उस क्षेत्र की काशी कह दिया गया. उत्तर में हिमालय के गढ़वाल अंचल में स्थित ‘उत्तर काशी’ में तो बाकायदा मणिकर्णिका घाट और विशाल त्रिशूल भी हैं. दक्षिण में कर्नाटक के मैसूर जिले में कपिला नदी के तट पर बसा नंजनगुड नगर को ‘दक्षिण काशी’ कहा गया है, जहां श्रीकांतेश्वर यानी लक्ष्मीपति विष्णु के स्वामी शिव का प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर है.

वैसे दक्षिण भारत में ‘दक्षिण काशी’ बनने का गौरव महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में समुद्र तट पर, पुष्पाद्रि पर्वत के ऊपर स्थित हरिहरेश्वर को भी प्राप्त है. गोला गोकर्णनाथ उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले का एक छोटा-सा नगर है, जिसके प्राचीन शिव मंदिर के कारण उसे ‘छोटी काशी’ कहा जाता है. यहां सावन में दूर-दूर से बहुत-से शिव-भक्त शिवलिंग पर जल चढ़ाने आते हैं. शिव मंदिर के पास ही भूतनाथ मंदिर है, जिसका अपना महत्व है.

इसके पीछे एक पौराणिक कथा है, जो मैने पहली बार सत्तर के दशक में आकाशवाणी के कवि सम्मेलन में वहां पहुंचने पर सुनी थी. उसके बाद इतना बड़ा अंतराल हो गया कि सब भूल गया. लेकिन पिछले साल लखीमपुर खीरी से लौटते समय जब थोड़ी देर के लिए वहां रुका, तो तरुण कवि कनक तिवारी ने न केवल मंदिर की पृष्ठभूमि बतायी, बल्कि वहां के प्रसिद्ध साहित्यकारों से मिलाया भी.

‘गोकर्ण’ का शाब्दिक अर्थ गाय का कान होता है. चूंकि शिव एक बार पृथ्वीरूपी गाय के कान से उत्पन्न हुए थे, इसलिए उनका एक नाम ‘गोकर्ण’ भी है. इसी तरह, ‘गोला’ उस पुरानी दुकान को कहते हैं, जिससे वहां बाजार बस गया हो.

लोकश्रुति है कि रावण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए कैलाश पर्वत पर कठोर तपस्या की. प्रसन्न होकर शिव स्वयं प्रकट हुए. वरदान के रूप में रावण ने इतनी शक्ति मांगी कि वहां से अपने आराधित शिवलिंग को उठा कर लंका नगरी ले जा सके. शिव ने तथास्तु तो कह दिया, मगर एक शर्त के साथ कि वह उसे कहीं रास्ते में धरती पर नहीं रखेगा.

रावण चला, रास्ते में उसे लघुशंका लगी. उसने एक चरवाहे को कांवर अपने कंधे पर रखने के लिए अनुरोध किया. चरवाहे ने कहा कि मैं केवल दो घड़ी तक कंधे पर रखूंगा. रावण को आने में देर हुई और चरवाहा कांवर वहीं छोड़ कर चला गया. रावण के आने तक शिवलिंग इतना दृढ़ हो गया था कि उठाये न उठे. क्रोधित रावण ने चरवाहे को दौड़ाया. चरवाहा भाग कर एक कुएं में कूद गया. वह कुआं आज भी भूतनाथ मंदिर के परिसर में है. भगवान शिव ने उस चरवाहे को भूतेश्वर की संज्ञा देकर अपनी महिमा के समतुल्य पूजनीय बनाया.

आज भी भूतनाथ महादेव मंदिर में नागपंचमी के बाद आनेवाले सोमवार को दूर-दराज से शिवभक्त जुटते हैं. इस कथा के आधार पर कुछ लोग ‘गोला’ को ‘ग्वाला’ भी मानते हैं.

यह कथा सुनते हुए मुङो कोई सुख नहीं मिला, क्योंकि उन मंदिरों के आसपास गंदे नालों में नगर की गंदगी दरुगध फैलाते हुए अविरल बह रही थी. जगह-जगह कचरों का अंबार लगा हुआ था. हां, उन प्राचीन जर्जर मंदिरों के आसपास दुकानदारी खूब जवां थी. नाक पर रूमाल रख कर उस छोटी काशी का माहात्म्य सुनना बड़ा कष्टदायक था.

मगर गत 18 नवंबर को अगहन मास के पहले सोमवार के दिन जब फिर से मुङो एक दिन गोला में रुकना पड़ा, तो उन मंदिरों का दृश्य पूरी तरह बदल चुका था. कनक ने बताया कि नगर में जो आप काया-कल्प देख रहे हैं, वह किसी अधिकारी के जुनून का प्रतिफल है और वह अधिकारी आपके पड़ोस में है. मैं उस परिवर्तन से इतना प्रभावित था कि आगे की यात्र स्थगित कर मैंने उस अधिकारी से मिलने का मन बना लिया. दस्तक देकर कमरे में घुसा, तो पूरे बिछौने पर मैथिलीशरण गुप्त और रामधारी सिंह दिनकर का साहित्य पसरा हुआ था।

आश्चर्य हुआ कि आइआइटी कानपुर का ग्रेजुएट एक प्रौद्योगिकीविद् आइएएस अधिकारी अपने निजी समय का उपयोग साहित्य पढ़ने में करता है, क्योंकि इससे उसे ‘आंतरिक ऊर्जा मिलती है.’ वह ऊर्जा उसे समाज में फैली आसुरी प्रवृत्तियों से लड़ने की क्षमता देती है. आचरण में विनम्रता और लक्ष्य प्राप्ति में कठोरता. बातों-बातों में पता चला कि वे बेगूसराय जिले के ही एक ग्रामीण परिवार के हैं. देर तक साहित्यिक वार्ता होती रही. उनकी यह मान्यता मेरे लिए अति सुखकर थी कि समाज में यदि सत्साहित्य का प्रचार-प्रसार पहले की तरह हो, तो समाज के अधिकांश अपराध स्वत: दूर हो जायेंगे.

वे सबेरे मुङो अपने साथ उन सारे मंदिरों के परिसर में ले गये, जहां का परिवर्तित रूप पहचान में नहीं आता था. गंदी नालियों को समेट कर भूभाग समतल बनाया गया था, जिस पर सैकड़ों भक्त बैठ कर कीर्तन-भजन कर सकते हैं. ऐसे चार-पांच सभा-स्थल बन चुके हैं. इनका दुरुपयोग न हो, इसके लिए नगर पालिका के नियमों में प्रावधान है कि केवल धार्मिक और सांस्कृतिक प्रयोजन से इन्हें दिया जायेगा.

शुरू में उन्हें काफी विरोध झेलना पड़ा, क्योंकि मंदिरों के आसपास की भूमि और भवनों पर स्थानीय लोगों ने कब्जा जमा लिया था. नगर में भक्तों के विश्रम के लिए तकरीबन 40 धर्मशालाएं थीं, जिन पर दबंगों ने कब्जा कर रखा है. चूंकि वे यहां अकेले रहते हैं, इसलिए जनसेवा के लिए उनके पास समय ही समय है. लोग अपनी व्यक्तिगत समस्याओं का हल ढूंढने भी उनके पास आ जाते हैं. ऐसे अधिकारी ‘बड़े लोगों’ की आंखों की किरकिरी तो हो ही जाते हैं, मगर जो अंत:करण से कुछ करना चाहता है, उसके लिए न समय की कमी रहती है, न साधनों की।

जो जगह आज भी पिछड़ी ही मानी जाती है, वहां 1925 में जमनालाल बजाज ने एशिया का सबसे बड़ा चीनी मिल लगाया था और उसका उद्घाटन करने प्रधानमंत्री नेहरू आये थे. जिस अतिथि गृह में मैं ठहरा था, उसको कभी महात्मा गांधी के आतिथ्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ था. उसी परिसर में लक्ष्मीनारायण मंदिर के सामने प्रदर्शनी के लिए रखे उस पुराने वाष्प-चालित इंजन को देख कर मैं धन्य हुआ, जिससे चीनी मिल संचालित होता था. गोला के पास के ही पंडित वंशीधर शुक्ल थे, जिनके बहुत सारे गीत सामान्य जन के कंठहार बन चुके हैं- ‘उठ जाग मुसाफिर भोर भयो, अब रैन कहां जो सोवत है.’

मूल काशी में परतंत्रता के दिनों में एक ‘काशी करवट’ होती थी. विश्वनाथ मंदिर के पास एक कुआं था, जिसमें लोग जीवन-जंजाल से मुक्त होने के लिए कूद कर जान दे देते थे. बचपन में मैंने उस कुएं में झांका भी था. मगर छोटी काशी ने जब-जब बड़ी करवट ली है, देश-प्रदेश के लिए अच्छा ही हुआ है।

मंदिर की भौगोलिक स्थिति

मंदिर तीनों ओर से वनों से आच्छादित छोटी काशी की परिधि में गोमती, कठिना, उल्ल, सरस्वती, सरायन आदि नदियां प्रवाहित होती रही हैं। रेलवे स्टेशन से शिव मंदिर की दूरी 390 मीटर है। मंदिर का क्षेत्रफल करीब 5000 वर्ग मीटर है। शिवमंदिर के तीन द्वार हैं। धरातल से गर्भ गृह की गहराई नौ फीट है। अष्टकोणीय गर्भगृह में शिवलिंग डेढ़ फीट गहराई में स्थापित है। गोकर्ण तीर्थ का क्षेत्रफल 5300 वर्ग मीटर है।

भूपूर्वानाथ मंदिर, लखीमपुर खीरी से है, तो यह नगर के प्राचीन शिव मंदिरों में से एक माना जाता है। इस मंदिर की पहचान स्थानीय परम्पराओं में भगवान शिव के एक प्राचीन धाम के रूप में है। मंदिर नगर के मेला मैदान क्षेत्र के निकट स्थित है और वर्षभर दर्शन के लिए खुला रहता है। भूपूर्वानाथ मंदिर तथा समीप स्थित भुईफोरवानाथ मंदिर दोनों स्थानीय श्रद्धा के प्रमुख केन्द्र हैं।

सांस्कृतिक महत्व

यह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि लखीमपुर खीरी की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का भी एक महत्वपूर्ण केन्द्र है। सावन के दौरान यहाँ विशेष मेले और धार्मिक आयोजन होते हैं, जिनमें दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।

पांडित्य श्री शरद अवस्थी जी द्वारा ई०मिडिया माध्यम से प्रकाशित आध्यात्मिकता पूर्ण लेख

लिलौतीनाथ मंदिर उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जनपद के फूलबेहड़ क्षेत्र के निकट, शारदा नगर रोड (संदा–महेवागंज क्षेत्र) में स्थित एक प्राचीन शिव मंदिर है। यह स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच अत्यंत पूजनीय है और विशेष रूप से सावन तथा महाशिवरात्रि के अवसर पर बड़ी संख्या में भक्त यहाँ दर्शन करने आते हैं।

मंदिर की प्रमुख मान्यताएँ:

  • स्थानीय परम्परा के अनुसार यह मंदिर महाभारत काल से जुड़ा माना जाता है।
  • एक प्रचलित लोकविश्वास है कि पाण्डवों ने अपने अज्ञातवास अथवा वनवास के दौरान यहाँ शिवलिंग की स्थापना की थी। यह धार्मिक परम्परा का भाग है, किन्तु इसका प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
  • श्रद्धालुओं के बीच यह भी मान्यता है कि यहाँ का शिवलिंग विशेष दिव्य महिमा वाला है और उसकी पूजा भगवान शिव की कृपा प्राप्त कराने वाली मानी जाती है।

धार्मिक महत्व:

  • भगवान शिव की नित्य पूजा एवं रुद्राभिषेक।
  • सावन के प्रत्येक सोमवार को विशेष जलाभिषेक।
  • महाशिवरात्रि पर विशाल श्रद्धालु समागम।
  • रुद्राष्टाध्यायी, महामृत्युंजय जप एवं शिवपुराण कथा का आयोजन।

पाण्डित्य परम्परा:

लिलौतीनाथ मंदिर के आसपास की धार्मिक परम्परा मुख्यतः वैदिक कर्मकाण्ड पर आधारित है। यहाँ के पुरोहित एवं आचार्य परम्परागत रूप से रुद्रपाठ, वैदिक मंत्रोच्चार, संस्कार (विवाह, उपनयन, गृहप्रवेश), शिवपुराण एवं धार्मिक प्रवचन, तथा गुरु-शिष्य परम्परा से कर्मकाण्ड का प्रशिक्षण का कार्य करते रहे हैं। यद्यपि इस पाण्डित्य परम्परा पर अभी तक स्वतंत्र अकादमिक शोध बहुत कम उपलब्ध है। इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां आज भी शिवलिंग की पूजा भक्तों के पहुंचने से पहले हो जाती है और शिवलिंग रंग भी बदलता हैं।

हमारा उद्देश्य:

हम भारतीय मंदिरों और धार्मिक परंपराओं के बारे में व्यापक और विश्वसनीय जानकारी प्रदान करके पाठकों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना चाहते हैं। आप एक तीर्थयात्री हों, एक इतिहास प्रेमी हों, या अपनी आध्यात्मिक यात्रा पर हों, हमारा लक्ष्य आपको ज्ञान, मार्गदर्शन और प्रेरणा प्रदान करना है।

जंगलीनाथ मंदिर

जंगलीनाथ मंदिर उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जनपद में स्थित भगवान शिव का एक प्राचीन एवं श्रद्धेय मंदिर है। स्थानीय परम्पराओं में इसे "जंगलीनाथ महादेव" के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर क्षेत्र के प्रमुख शिवधामों में गिना जाता है और सावन, महाशिवरात्रि तथा श्रावण सोमवारों पर यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुँचते हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:

उपलब्ध ऐतिहासिक उल्लेखों के अनुसार लखाही राज के शासक राजा राम बख्श सिंह राठौर ने 18वीं शताब्दी के प्रारम्भ में श्री जंगलीनाथ महादेव मंदिर का निर्माण कराया था। यह उल्लेख लखाही राज के इतिहास से संबंधित स्रोतों में मिलता है।

ओयल का मेंढक मंदिर

खीरी जनपद में भगवान शिव का अनूठा मंदिर है। यहां मेंढक की पीठ पर भगवान भोलेनाथ विराजमान हैं। इस मंदिर में भगवान के साथ मेंढक की भी पूजा होती है। ओयल कस्बे में मंडूक तंत्र और श्री यंत्र के आधार पर निर्मित नर्मदेश्वर महादेव मंदिर अपनी अनूठी और अद्भुत वास्तु संरचना के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। इसे मेंढक मंदिर भी कहा जाता है।

मान्यता है कि सूखे और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा से प्रजा को बचाने के लिए ओयल स्टेट के शासकों ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। यह मंदिर सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। यहां देशभर से हजारों भक्त दर्शन को आते हैं और भगवान शिव से परिवार की सुख समृद्धि की कामना के लिए करते हैं।

अगर आप भगवान शिव के भक्त हैं तो इस मंदिर के दर्शन करने जरूर जाना चाहिए। हिमालय की तलहटी में बसा पूरा तराई क्षेत्र शैव संप्रदाय का प्रमुख केंद्र था। यह क्षेत्र 11वीं सदी से 19वीं सदी तक चाहमान शासकों के आधीन रहा। चाहमान वंशी ओयल स्टेट के शासक राजा बख्त सिंह ने करीब दो सौ साल पहले प्राकृतिक दैवीय आपदा से बचाव के लिए मंडूक तंत्र और श्री यंत्र पर आधारित अनूठे मंदिर का निर्माण शुरू कराया था। मंदिर राजा बख्त सिंह के उत्तराधिकारी राजा अनिरुद्ध सिंह के समय में बनकर तैयार हुआ।

बताया जाता है कि इस शिव मंदिर की वास्तु परिकल्पना कपिला के एक महान तांत्रिक ने की थी। मुख्य मंदिर विशालकाय मेंढक की पीठ पर बना हुआ है। मेंढक का मुंह उत्तर की ओर है। पिछला हिस्सा दक्षिण की ओर और दो पैर पूर्व दिशा में और दो पैर पश्चिम की दिशा में दिखाई देते हैं। शिवलिंग पर अर्पित किया जाने वाला जल नलिकाओं के जरिए मेंढक के मुंह से निकलता है।

मेंढक की पीठ पर काफी ऊंचा अष्टकोणीय चबूतरा है। गर्भ गृह में पहुंचने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं। इस अष्टकोणीय चबूतरे का आकार श्री यंत्र जैसा है। सबसे ऊपर गर्भ गृह है। गर्भ गृह में सफेद संगमरमर का करीब तीन फिट ऊंचा अरघा है। जिस पर नर्मदेश्वर शिवलिंग स्थापित है। अरघे पर सहस्त्रदल कमल की आकृति बनी हुई है। गर्भगृह का द्वार पूरब की ओर है। गर्भगृह के बाहर परिक्रमा पथ भी बना है।

आम तौर से शिव मंदिरों में भगवान भोलेनाथ के वाहन नंदी की मूर्ति बैठी मुद्रा में होती है लेकिन मेंढक शिव मंदिर में नंदी की प्रतिमा खड़ी मुद्रा में स्थापित है। बताया जाता है कि ओयल का मेंढक शिव मंदिर एकलौता ऐसा शिव मंदिर है, जहां नंदी खड़ी मुद्रा में स्थापित हैं। यह इस मंदिर की एक बड़ी विशेषता है। मंदिर की देखरेख और रखरखाव का काम ओयल राजपरिवार के लोग करते हैं। तंत्र विद्या के अनुसार मेंढक सुख समृद्धि का प्रतीक है। इसलिए दीपावली के मौके पर यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है। भगवान शिव के साथ मेंढक की भी पूजा करते हैं। मेंढक मंदिर में दीपावली के अलावा महाशिवरात्रि पर भी भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती हैं। मान्यता है कि मंदिर में पूजा करने पर हर किसी की मनोकामना पूरी होती है और विशेष फलों की प्राप्ति होती है।

रामायण वैदिक एजुकेशन फाउंडेशन

हम भारतीय मंदिरों और धार्मिक परंपराओं के बारे में व्यापक और विश्वसनीय जानकारी प्रदान करके पाठकों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना चाहते हैं। आप एक तीर्थयात्री हों, एक इतिहास प्रेमी हों, या अपनी आध्यात्मिक यात्रा पर हों, हमारा लक्ष्य आपको ज्ञान, मार्गदर्शन और प्रेरणा प्रदान करना है।

वर्षवार विभिन्न आध्यत्मिक संस्थओं के नाम

वर्षः २०२४

  • श्रीदेवानन्द गौडीय मठ वर्न्दावन
  • श्रीगोपीनाथ गौडीय जी मठ वर्न्दावन
  • श्रीदुर्वाषा ऋषि गौडीय मठ हरिद्वार
  • श्री नीलांचल गौडीय मठ उड़ीसा
  • श्री राम नाम बैंक (प्रबंधक़/संस्थापक) कानपुर
  • श्री राम नाम विश्व समिति हरिद्वार
  • राम रमापति बैंक दश्मेश्वर वाराणसी
  • श्री राम नाम बैंक प्रयागराज
  • श्री राम नाम बैंक अद्योध्या
  • अनुरुध यूनिवर्सल बैंक ऑफ़ रामायण बॉम्बे
  • संस्कृत भारती नई दिल्ली

वर्ष २०२६

  • माँ अन्नपूर्ण मंदिर चैरिटीबल ट्रस्ट वाराणसी
  • राम वेद विद्यालय जानकी घाट अयोध्या
  • गीता प्रेस गोरखपुर वार्षिक सदस्यता

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